
भरण-पोषण (Maintenance) का अर्थ है किसी व्यक्ति की जीवन-निर्वाह की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए दी जाने वाली आर्थिक सहायता। भारतीय कानून में पत्नी, बच्चों, तलाकशुदा महिलाओं और आश्रित माता-पिता को भरण-पोषण का अधिकार दिया गया है। यह अधिकार विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों और दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अंतर्गत आता है।
भरण-पोषण का अधिकार कब शुरू होता है?
पत्नी के भरण-पोषण का दायित्व विवाह के साथ ही शुरू हो जाता है। पति की जिम्मेदारी है कि वह अपनी पत्नी और आश्रितों की आवश्यकताओं की पूर्ति करे, बशर्ते वे स्वयं निर्वाह करने में असमर्थ हों।
दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अंतर्गत भरण-पोषण
दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के अनुसार भरण-पोषण का अधिकार निम्नलिखित को प्राप्त है:
- पत्नी
- आश्रित बच्चे
- तलाकशुदा पत्नी
- गरीब और आश्रित माता-पिता
पहले भरण-पोषण की अधिकतम सीमा 500 रुपये प्रति माह थी, लेकिन दंड प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम, 2001 द्वारा यह सीमा समाप्त कर दी गई है। अब न्यायालय पति की आर्थिक स्थिति और आय के अनुसार उचित राशि तय करता है।
इस प्रावधान का सबसे बड़ा लाभ यह है कि भरण-पोषण की राशि तेजी से और कम खर्च में प्राप्त की जा सकती है।
⚠️ यदि किसी तलाकशुदा पत्नी को उसके व्यक्तिगत कानून के अंतर्गत पहले से भरण-पोषण मिल रहा है, तो वह CrPC के तहत पुनः दावा नहीं कर सकती।
हिंदू विधि के अंतर्गत भरण-पोषण
हिंदू महिलाओं का भरण-पोषण अधिकार हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के अंतर्गत आता है।
- पत्नी को पति से भरण-पोषण का पूर्ण अधिकार है
- यदि पत्नी बिना उचित कारण पति के साथ नहीं रहती, तो वह इस अधिकार से वंचित हो सकती है
- न्यायालय यह तय करता है कि पत्नी का अलग रहना उचित है या नहीं
भरण-पोषण तय करते समय न्यायालय किन बातों पर ध्यान देता है?
- पति की आय और देनदारियाँ
- पत्नी की आवश्यकताएँ
- वैवाहिक जीवन स्तर
- दोनों पक्षों का आचरण
मुकदमे की लंबित अवधि के दौरान अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे का खर्च उस पक्ष द्वारा वहन किया जाता है जिसके पास आय उपलब्ध हो।
मुस्लिम महिलाओं के लिए भरण-पोषण कानून
मुस्लिम महिला (तलाक के अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के हितों की रक्षा करता है।
इस अधिनियम के अंतर्गत तलाकशुदा मुस्लिम महिला को निम्न अधिकार प्राप्त हैं:
- इद्दत की अवधि के दौरान पूर्व पति से उचित और न्यायसंगत भरण-पोषण
- बच्चों के जन्म से दो वर्ष तक उनका भरण-पोषण
- विवाह के समय तय की गई मेहर (दहेज) की राशि
- विवाह से पहले, दौरान या बाद में मिली सभी संपत्ति का अधिकार
यदि महिला इद्दत के बाद स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ है, तो:
- मजिस्ट्रेट उसके वारिसों को भरण-पोषण देने का आदेश दे सकता है
- यदि वारिस असमर्थ हों, तो माता-पिता या
- अंतिम स्थिति में राज्य वक्फ बोर्ड को भुगतान का आदेश दिया जा सकता है
पारसी विवाह एवं तलाक अधिनियम, 1936
इस अधिनियम के अनुसार:
- तलाक की कार्यवाही के दौरान पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण दिया जाता है
- न्यायालय पति की शुद्ध आय के पाँचवें हिस्से तक की राशि निर्धारित कर सकता है
- स्थायी भरण-पोषण तय करते समय दोनों पक्षों के आचरण पर विचार किया जाता है
- पत्नी के पुनर्विवाह तक भरण-पोषण जारी रहता है
निष्कर्ष
भारत में भरण-पोषण कानूनों का उद्देश्य महिलाओं, बच्चों और आश्रित माता-पिता को सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना है। अलग-अलग धर्मों के लिए अलग कानून होते हुए भी, सभी का मूल उद्देश्य न्याय और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करना है।



