
भारत एक विविधतापूर्ण देश है, जहाँ धर्म और परंपराओं के अनुसार गोद लेने (Adoption) और संरक्षकता (Guardianship) के अलग-अलग कानून लागू हैं। हर समुदाय में बच्चे के अधिकार, अभिभावक की भूमिका और गोद लेने की प्रक्रिया भिन्न होती है।
⚖️ हिंदू कानून के तहत गोद लेना
हिंदू समुदाय के लिए हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 (Hindu Adoption and Maintenance Act, 1956) लागू है।
इस अधिनियम के अनुसार—
- कोई भी कानूनी रूप से सक्षम हिंदू पुरुष या महिला किसी बच्चे को गोद ले सकता है।
- गोद लिया गया बच्चा अपने दत्तक माता-पिता की संतान माना जाता है और उसे पूर्ण उत्तराधिकार अधिकार (Inheritance Rights) प्राप्त होते हैं।
- यह अधिनियम हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख समुदायों पर लागू होता है।
🕌 मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदायों में गोद लेना
इन समुदायों के लिए कोई अलग गोद लेने का धार्मिक कानून (Personal Law) नहीं है।
ऐसे में इन्हें संरक्षकता एवं पालन-पोषण अधिनियम, 1890 (Guardians and Wards Act, 1890) के तहत अदालत की अनुमति से बच्चे को पालन-पोषण (Guardianship) के रूप में रखना होता है।
- इस प्रक्रिया में बच्चे को केवल पालन-पोषण का अधिकार मिलता है, न कि उत्तराधिकार का।
- जब बच्चा वयस्क होता है, तो वह अपने संरक्षक से कानूनी संबंध समाप्त कर सकता है।
- विदेशी नागरिक भी भारतीय बच्चों को इसी अधिनियम के तहत गोद ले सकते हैं, लेकिन उन्हें अदालत की मंजूरी लेनी पड़ती है।
👶 हिंदू संरक्षकता कानून
हिंदू बच्चों की संरक्षकता से संबंधित नियम हिंदू अवयस्क एवं संरक्षकता अधिनियम, 1956 में दिए गए हैं।
इसमें कहा गया है—
- बच्चा 18 वर्ष की आयु तक अवयस्क (Minor) रहता है।
- पिता को पहले प्राकृतिक संरक्षक (Natural Guardian) का दर्जा मिलता है, उसके बाद माता को।
- पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की देखभाल में माँ को प्राथमिकता दी जाती है।
- नाजायज संतान के मामले में माता को पिता से अधिक अधिकार प्राप्त हैं।
🕋 मुस्लिम संरक्षकता कानून
मुस्लिम विधि में दो प्रमुख धाराएँ मानी जाती हैं — सुन्नी और शिया।
दोनों में कुछ भिन्नताएँ हैं, लेकिन सामान्य नियम इस प्रकार हैं:
- पिता को संपत्ति और व्यक्ति दोनों पर संरक्षक का अधिकार है।
- पिता की मृत्यु के बाद माँ को संरक्षक नियुक्त किया जा सकता है।
- माँ को अभिरक्षा (Custody) का अधिकार विशेष रूप से बच्चे की प्रारंभिक अवस्था में होता है।
- शिया मत: माँ का अधिकार केवल स्तनपान की अवधि तक।
- हनफ़ी मत: माँ का अधिकार लड़की के यौवन तक और लड़के के सात वर्ष की आयु तक।
⚖️ सामान्य कानून – संरक्षकता एवं अभिरक्षा अधिनियम, 1890
यह अधिनियम सभी समुदायों पर समान रूप से लागू होता है और कहता है:
- पिता बच्चे का प्रमुख संरक्षक होता है।
- न्यायालय तभी किसी अन्य व्यक्ति को संरक्षक नियुक्त कर सकता है, जब पिता अयोग्य या अनुपस्थित हो।
- बच्चे के कल्याण (Welfare of Child) को सर्वोच्च महत्व दिया जाता है।
📘 निष्कर्ष
भारत में गोद लेने और संरक्षकता के कानून धर्म और परंपरा के अनुसार अलग-अलग हैं।
जहाँ हिंदुओं के पास एक स्पष्ट अधिनियम है, वहीं अन्य समुदायों को संरक्षकता कानून का सहारा लेना पड़ता है।
हर स्थिति में बच्चे के हित और कल्याण को सर्वोपरि रखा जाता है — यही भारतीय न्याय प्रणाली की मूल भावना है।
FAQs
☞ नई दिल्ली में स्थित है।
☞ केवल हिंदू दत्तक ग्रहण अधिनियम के तहत गोद लिए गए बच्चे को उत्तराधिकार का अधिकार मिलता है।
☞ हाँ, लेकिन उन्हें अदालत की अनुमति संरक्षकता एवं पालन-पोषण अधिनियम, 1890 के अंतर्गत लेनी होती है।
☞ हिंदू कानून के अनुसार पहले पिता और उसके बाद माता। पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों में माँ को प्राथमिकता दी जाती है।
☞ अदालत हमेशा बच्चे के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण को ध्यान में रखकर निर्णय लेती है।





